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  • आन्दोलनमा मधेसी मोर्चाका १० गलतीहरू

    आन्दोलनमा मधेसी मोर्चाका १० गलतीहरू

    मोर्चाले आन्दोलनलार्इ तुहाएको छ । मधेसी मोर्चाले यस आन्दोलनको एजेण्डालार्इ नै कमजोर पारेको छ । फेरी पनि यो समाप्त भएको छैन ।

  • फोरम नेपाल का अन्त्यः सत्ता समर्पण-मुद्दा विर्सजन का नयां दौर

    विगत कइ महिनों से फोरम का तमलोपा से एकिकरण का प्रयास चल रहा था । स्वयं उपेन्द्र जी तथा महन्थ ठाकुर जी ने इस प्रगति को गर्व के साथ स्वीकार करते हुए संचार माध्यम मे दिखे थे । यह अन्जाम नही पा सका । उपेन्द्र को महन्थ ठाकुर का ब्रम्हण जातीय नेतृत्व स्वीकार करने झिझक हुइ हो या महन्थ जी का सदैव का प्रजातन्त्रवादी–गैर कम्युनिष्ट दर्शन उपेन्द्र को पसन्द न आया हो । एक दुसरे का साथ काम नही कर सके । जब कि एक मधेस प्रदेश की मान्यता को ही जड से अस्वीकार करने बाले सदैव कम्युनिष्ट पृष्ठभूमि के अशोक रार्इ को उन्होने गले लगाया ।

  • नेपाल प्रहरीको आधारभूत अमानवीय प्रवृति

    नेपाल प्रहरीको आधारभूत अमानवीय प्रवृति

    कुनै पुलिस अधिकृतको अनुहारमा रविन हुडको रंग देख्ने हाम्रो वौद्धिकहरू अहिले फेसबुकमा कमेन्ट लेखे वापत बाराका राजु साह (सरकारी अधिकृत) र सप्तरीका नागरिक रहमानले थुनामा जानु परेपछि आकाशबाट खसे सरह भएका छन् ।

  • तमरा अभियानको अपीलः संविधान सभा प्रगिमनकारी पक्षको क्रिडास्थल हुदैछ ।

    कांग्रेस-एमाले र माओवादीको आसन्न सहकार्य अनि सत्ता समर्पणवादी मधेसी दलहरूको पिछलग्गूपनले राज्यको संरचनामा आमूल परिवर्तन चाहने पक्षहरूलाई घोर धोका हुने निश्चित छ ।

  • तराई मधेस राष्ट्रिय अभियानको प्रेस वक्तव्य

    तराई मधेस राष्ट्रिय अभियानको प्रेस वक्तव्य

    आज जेठ १४ गते राजविराजमा एक प्रेस वक्तव्य जारी गर्दै मधेसी जनअधिकार फोरम-मधेसका बरिष्ट उपाध्यक्ष विवेकानन्द सिंह र महासचिव सुरेन्द्र साह लगायत दर्जनभर केन्द्रीय सदस्यहरु तराई मधेस राष्ट्रिय अभियानमा सरिक हुनु भएको छ । तराई मधेस राष्ट्रिय अभियानका केन्द्रीय संयोजक जय प्रकाश गुप्ताले अभियानका गतिविधीहरुको जानकारी सार्वजनिक गर्ने उद्देश्यले आयोजना गर्नु भएको पत्रकार सम्मेलनमा सो को जानकारी गराइएको हो ।

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फोरम नेपाल का अन्त्यः सत्ता समर्पण-मुद्दा विर्सजन का नयां दौर


 फोरम नेपाल का अन्त्यः सत्ता समर्पण-मुद्दा विर्सजन का नयां दौर

 
जय प्रकाश गुप्ता


 
             मधेसी जन अधिकार फोरम, नेपाल का जन्म उस वक्त हुआ जब एक बार फिर मधेस की राजनीतिक आन्दोलन शिथिल हो चुका था । नेपाल सद्भावना पार्टी कई टुक्रो मे बिखर गई थी । माओवादीयों ने उपेक्षित, उत्पीडित क्षेत्र एवं समुदाय का मुक्ति के सवाल को जोर से उठाया था । पहाडी क्षेत्रों मे जातीय मुक्ति का सवाल सर्वत्र उठना शुरु हुआ था । उस समय वि.स. २०५४ साल मे विराटनगर मे रह रहे उपेन्द्र यादव समेत मधेसी नागरिक समाज के लोगों ने मधेसी समुदाय का समस्याओं को उजागर करने लिए फोरम का अवधारणा को आगे बढाया । फोरम के गठन से पहले का प्रारम्भिक दौर मे उपेन्द्र यादव ने मधेस के अनेकन् लोगों से परामर्श किया था ।

 उपेन्द्र यादव व्यक्तिगत तौर पर वामपंथी नेता सहना प्रधान और मनमोहन अधिकारी के नेतृत्व मे रहा तत्कालिन नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के छात्र संगठन नेपाल प्रगतिशील विद्यार्थी यूनियन (नेप्रवियू) से सम्बन्ध रखते थे । उपेन्द्र यादव जीवन मे पहली वार वि.स. २०४२ मे नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व मे हुए सत्याग्रह आन्दोलन मे गिरफ्तार होकर ६ महिना तक सेन्ट्रल जेल में रहे थे । वि.स. २०४७ साल के जन आन्दोलन के वाद इस कम्युनिष्ट घटक का विलय नेकपा (माले) मे होकर नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी एमाले बनने के बाद वे एमाले पार्टी के तरफ से सुनसरी संसदीय क्षेत्र नं. ४ से उम्मेदवार थे । इस चुनाव में उन की जमानत जफ्त हुआ । सुनसरी मे उन के खिलाफ एमाले का दुसरा स्थानीय नेता जगदीश कुसियैत से शुरू किया गया एमाले के भीतर की गुटवन्दी से परेशान उपेन्द्र यादव तब गजेन्द्र नारायण सिंह के नजदिक पहुंचे, जहां वे मधेस की समस्याओं से ज्यादा परिचित हुए । गजेन्द्र नारायण सिंह से प्रभावित उपेन्द्र यादव नेपाल सद्भावना पार्टी मे सहयोगी की भूमिका मे सरिक हुए और उस पार्टी का विराटनगर मे हुआ राष्ट्रिय महाधिवेशन मे सहभागी थें । बिभिन्न कारणों से सद्भावना पार्टी उन्हे रास नही आया और उसी समय माओवादी पार्टी से सम्बन्धित और विराटनगर क्षेत्र मे जातीय मोर्चाओं को संगठित करने हेतू कार्यरत् सुरेश आले मगर से उन का परिचय हुआ । यही से वे माओवादी के निकट पहुंचे । और, मधेस मे माओवादी पार्टी के संगठन विस्तार करने का माओवादी रणनीति के तहत फोरम नेपाल को माओवादी संगठन से जोडा । माओवादी नेता मोहन बैद्य किरण उस समय पूवार्ञ्चल के इंचार्ज थे । उपेन्द्र यादव मोहन बैद्य से माओवादी शिक्षा मे दीक्षित और संगठित   हुए । अब फोरम नेपाल अदृश्य रूप में माओवादीओं का ही एक अंग बना ।

उपेन्द्र यादव का एक ही समय तीन पार्टी, एमाले, सद्भावना और माओवादी से ताल्लुकात को एमाले पचा नही पाया । उन के खिलाफ अनुशासन की कारवाही चलाया गया । फिर भी उपेन्द्र वास्तविकता को छुपाए हुए एमाले मे भी आते जाते   रहें । एमाले पार्टी का नेपालगञ्ज महाधिवेशन के समय स्वयं का घोर उपेक्षा किए जाने से उन्होने एमाले का परित्याग किया । इस के वाद उपेन्द्र यादव जातीय राजनीति मे लगे और गोपाल सेवा समिति (यादव समुदाय का जातीय संगठन) के मोरंग जिला कार्य समिति के अध्यक्ष बने । माओवादी पत्रकार रामरिझन यादव सचिव थें ।

 उपेन्द्र अब पूर्णकालिन माओवादी कार्यकर्ता थें । माओवादी संलग्नता के आरोप मे उपेन्द्र यादव भूमिगत हुए और फिर भारत मे रहने लगें । तत्कालिन कांग्रेसी प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा के समय मे माओवादी के साथ सरकार की वार्ता प्रारम्भ हुइ । उपेन्द्र यादव नेपाल आए । सप्तरी के मधेसी नेता आर.डी. आजाद फोरम के महासचिव थें । वि.स. २०५९ मे विराटनगर मे मधेसी जन अधिकार फोरम, नेपाल का पहला महाअधिवेशन हुआ जिसके प्रमुख अतिथी रामराजा प्रसाद सिंह थें । इस महाअधिवेशन का सम्पूर्ण खर्च माओवादी पार्टी ने जुटाया था और माओवादी के केन्द्रीय नेता कुमार पौडेल अधिवेशन मे माओवादी पार्टी के तरफ से औपचारिक इंचार्ज के रूप मे उपस्थित थें । जेल से रिहा होने के बाद नेपाली कांग्रेस को परित्याग कर जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता इस अधिवेशन मे सरिक हुए थें । दो दिवसीय इस महाअधिवेशन का दुसरा दिन ही सरकार-माओवादी शांतिवार्ता भंग हुइ और देश मे संकटकाल की घोषणा हुइ । उपेन्द्र यादव अधिवेशन स्थल से ही भाग कर  फिर भारत चले गए । अब फोरम नेपाल का नेतृत्व जय प्रकाश गुप्ता ने सम्हाला । वि.स. २०६२/६३ के जन आन्दोलन के वाद उपेन्द्र यादव भारत प्रवास से नेपाल वापस आये । इस समय तक जय प्रकाश गुप्ता ने मधेस के १३ जिलो मे फोरम का जिला संगठन तथा ४ भातृ संगठन का निर्माण कर राजधानी काठमांडू मे उपेन्द्र जी का स्वागत किया । जय प्रकाश गुप्ता ने ही उन का भारत से वापसी के वाद २०६४, बैशाख २५ गते काठमांडू का एप्रोक्स हल मे एक सभा का आयोजन कर ये महाशय उपेन्द्र यादव है कहते हुए कर उन का परिचय करवाया था ।

मधेसी जन अधिकार फोरम, नेपालको संयोगवश वि.स. २०६४ साल मे हुए पहला मधेस विद्रोह मे नेतृत्व का श्रेय प्राप्त हुआ । वि.स. २०६४ का संविधान सभा के निर्वाचन मे फोरम नेपाल संसद और संविधान सभा मे चौथा बडा शक्ति के रूप मे उभरा । परन्तु, कुछ ही समय के वाद यह पार्टी नेपाल सद्भावना पार्टी के तरह ही मधेसियों के प्रति विभेद, उत्पीडन और शोषण के खिलाफ संघर्ष करने के बजाय अपने उद्देश्य से विमुख होकर वोट की जातिवादी राजनीति, स्वयं उपेन्द्र यादव का सत्ता के प्रति अन्ध आशक्ति और उन के द्वारा ही गुटबन्दी का सिर्जना, मधेस की मुद्दाओं का परित्याग, पार्टी के संगठन को निजी भोग-विलास के साधन जुटाने का माध्यम मे रूपान्तरित करना-इस प्रकार की कार्यो को प्राथमिकता देने से यह पार्टी नीतिगत रूप से दिशाहीन और विचलित हो गयी । उपेन्द्र यादव ने फोरम के अनेकन् स्थापनाकालीन नेता जैसे आर.डी. आजाद, रामरिझन यादव, डा. महानन्द ठाकुर, जय प्रकाश गुप्ता, महादेव साह, भीम राजवंशी, परमानन्द मेहता, डा. शिवशंकर यादव, राम प्रसाद साह, नेवालाल यादव, भाग्यनाथ गुप्ता, सुरेन्द्र साह, डा. मनोज सिंह, कृष्ण बहादुर यादव लगायत इसी तरह बाद में जुडे सीतानन्दन राय, अमर यादव, किशोर विश्वास, जितेन्द्र सोनल, राम कुमार शर्मा, उपेन्द्र झा समेत को दुध मे परे मच्छी के तरह फेकंते गए । फलतः पहली संविधान सभा मे ५३ स्थान प्राप्त यह पार्टी वि.स. २०७० मे सम्पन्न संविधान सभा का दुसरा निर्वाचन मे समानुपातिक सिर्फ १२ स्थान ही सुरक्षित कर पाया । अल्प समय मे बारम्बार विभाजित यह पार्टी अब एक बिजातीय सता समिकरण के तहत अपना नाम, इतिहास एवं साख को समाप्त किया हैं ।

विगत कइ महिनों से फोरम का तमलोपा से एकिकरण का प्रयास चल रहा था । स्वयं उपेन्द्र जी तथा महन्थ ठाकुर जी ने इस प्रगति को गर्व के साथ स्वीकार करते हुए संचार माध्यम मे दिखे थे । यह अन्जाम नही पा सका । उपेन्द्र को महन्थ ठाकुर का ब्रम्हण जातीय नेतृत्व स्वीकार करने झिझक हुइ हो या महन्थ जी का सदैव का प्रजातन्त्रवादी–गैर कम्युनिष्ट दर्शन उपेन्द्र को पसन्द न आया   हो । एक दुसरे का साथ काम नही कर सके । जब कि एक मधेस प्रदेश की मान्यता को ही जड से अस्वीकार करने बाले सदैव कम्युनिष्ट पृष्ठभूमि के अशोक रार्इ को उन्होने गले लगाया । इस से भी परे सदैब खस राज्य सता को दोषी देखने बाले उपेन्द्र जी एक खसवादी पार्टी को भी नइ दल मे सहभागी कराया हैं । एकिकरण घोषणा सभा मे उपेन्द्र जी ने गर्व से कहा कि अब उन की दल संसद का पांचवा शक्ति बन गया हैं । जाहीर है की, यह एकिकरण मधेस के लिए नही हुआ है, परन्तु सता ही इस कार्य का ध्येय है ।

 उपेन्द्र यादव मे आज तक सत्ता के प्रति अन्ध आशक्ति, स्वयं के द्वारा गुटबन्दी का सिर्जना,  मधेस की मुद्दाओं का परित्याग,  पार्टी के संगठन को निजी भोग-विलास के साधन जुटाने का माध्यम मे रूपान्तरित करना आदि जो भी चरित्रगत दोष देखा गया हो । परन्तु मधेसी जनअधिकार फोरम नाम का मधेस  आन्दोलन का विरासत एक पार्टी जिन्दा था । अब मधेसी जनअधिकार फोरम नही   रहा । जय मधेस का अभिवादन अब नमस्कार मे बदला जा चुका हैं । मधेसी जन अधिकार फोरम, नेपाल अब मधेस के विभिन्न जात/जाति, भाषा-भाषी, वर्ग, धर्म, विचारधारा एवं विभिन्न सिद्धान्तों में आस्था रखनेवाले मधेसियों जो पिछले दिनों मे भ्रमबश ही सही इस पार्टी के  नीति, सिद्धान्त एवं कार्यक्रम तथा उद्देश्यों का समर्थन करता रहा हैं- वह मधेसी जनअधिकार फोरम अब नही रहा । मधेसीयों का भावनात्मक साझा संगठन संघीय समाजवादी फोरम नेपाल नही हो सकता हैं ।

 फोरम नेपाल एवं उपेन्द्र यादव कुछ पहले ही संविधान सभा में मधेस के सवालों को त्याग चुके थे । नर्इ संविधान में सरकारी कामकाज का भाषा में नेपाली को मानना, मधेस में तीन प्रदेश (पश्चिम में १, मध्य में १ तथा सिरहा से झापा तक १) की अवधारणा में सहमत होना, नर्इ संसद में मधेस से सीट संख्या को घटाने पर सहमति देना–कर्इ तथ्यगत उदाहरण है, जिस से ज्ञात होता है की मधेस की सवालो पर अब उपेन्द्र जी का कोर्इ लगाव नही रहा । यह सवाल एवं परिस्थिति फोरम नेपाल से जुडे हुए, अभी अनिच्छा के साथ संघीय समाजवादी फोरम मे पहुंचे सभी नेता कार्यकर्ता के लिए विचारणीय बिषय बन गया   है ।

 
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